इफ़तार पार्टियां
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*🥀 इफ़तार पार्टियां 🥀*
*पोस्ट-14*
✏️ आजकल रमज़ान के रोज़े की इफ्तार जो एक इस्लामी सुन्नत है वह एक फैशन बन गई है इन मौजूदा दौर की फैशनएबिल सियासी इफ्तार पार्टियों से बचना चाहिये इन में कई तरह की खराबियां पाई जाती हैं।
पहली बात तो यह है कि इन इफ्तार पार्टियों में अक्सर जगह दुनिया दार थे रोजेदार लोग दावत देकर बुलाये जाते हैं यहां तक कि गैर मुस्लिमो तक को शरीक किया जाता है। मैं पूछता हैं कि जिनके रोज़े नहीं या जिनके लिये रोजे हैं ही नहीं उनको इफ्तार के नाम पर जमा करना इफ्तार कराना नही बल्कि इस्लामी कामों का एक तरह , से मज़ाक उड़ाना है गैर मुस्लिमों से दुनियवी ताल्लुकात रखने में कोई गुनाह नहीं लेकिन उनके मज़हब से खुद को बचाना और अपने मज़हब को उनसे बचाना जरूरी है उनसे दुनियवी ज़ाहिरदारियां और ताल्लुकात तो हो सकते हैं। लेकिन मज़हबी घाल मेल नहीं होना चाहिये।
बाज़ जगह तो इन इफ्तार पार्टियों में यह तक देखा कि मालदार दौलतमन्द और सियासी रहनुमा और बे रोज़ेदारों और गैर मुस्लिमों की खूब आओ भगत होती है और नमाज़ी रोज़ेदार बा शरअ दीनदार मुसलमानों की तरफ कोई तवज्जो नहीं दी जाती इन की ना कदरी होती है और इन्हें भी अपनी ना कदरी कराने में बहुत मज़ा आता है वरना यह वहां ना जाते।
कुछ जगह इफ्तार पार्टियों में खड़े खड़े या मेज़ कुर्सी वगैरह पर बैठ कर जूते पहने पहने खाया पिया जाता है यह एकदम शरिअत के खिलाफ़ और मकरूह है और यह सिर्फ इफ्तार में ही नहीं बल्कि हर खाना जो इस तरह खाया जाये वह ममनू हैं। और हमारे बहुत से मुसलमान भाई इस पर फख्र महसूस करते हैं बात दरअसल यह है कि मज़हबे इस्लाम और इस के तौर तरीकों को गैर मुस्लिम बाद में पहले खुद मुसलमान मिटा रहे हैं और हमारे ही जनाज़े हैं और हमारे ही कांधे हैं।
इफ्तार पार्टियों में शरीक होकर बहुत सारे लोग मग़रिब की जमाअत छोड़ बैठते हैं बाज़ बाज़ तो सिरे से नमाज़ ही छोड़ बैठते हैं। यह सब गुनाह और हराम है।
खुलासा यह कि आज की अक्सर इफ्तार पार्टियां रोजे के इफ्तार कराने का सवाब हासिल करने के लिये नहीं की जाती हैं। बल्कि सियासी रोटियां सेंकने और मुसलमानों को रिझाने के हथकंडे है।
हां अगर मुसलमान लोग आपस में एक दूसरे को रोज़े की इफ्तार करायें ख्वाह घरों में बुलाकर या मस्जिदों में इफ्तार का सामान भेज कर या राहगीर रोजेदारों को रोक कर तो यह सब खालिस इस्लामी काम हैं और जन्नत के सामान हैं।
अगर कोई गैर मुस्लिम किसी रोज़ेदार मुसलमान को इफ्तार के लिये खाने पीने का सामान दे तो इसको लेना और खाना गुनाह न होगा जबकि उसको एहसान जतलाने या खुद एहसान की वजह से दबने का खतरा न हो और यह भी नही समझना चाहिये कि उसको इस का कुछ सवाब मिलेगा जो मुसलमान नहीं उसके लिये आखरत में कुछ सवाब नहीं हां दुनिया में इन्हें कभी कभी इनकी नेकियों का बदला और इनाम बल्कि ईमान तक दे दिया जाता है। अल्लाह व रसूल की रहमत दुनिया में गैर मुस्लिमों के लिये भी है लेकिन आखरत व जन्नत तो सिर्फ गुलामाने मुहम्मद मुस्तफ़ा के लिये है। सल्ललल्लाहो अलैह वसल्लम
*📚रमज़ान का तोहफ़ा सफ़हा 20,21,22*
*✍️मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी*
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