नमाज़ मे ज़्यादा लम्बी क़िरअत मकरूह है
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*🥀 नमाज़ मे ज़्यादा लम्बी क़िरअत मकरूह है 🥀*
*पोस्ट- 11*
✏️ और जो इमाम व हाफिज़ ज़्यादा ज़्यादा कुरआन पढ़ने के लिये ज़ल्दी ज़ल्दी में सही तौर पर मख़ारिज की अदायगी नहीं कर पाते या कुछ हुरूफ व कलमात या ज़ेर ज़बर पेश की हरकात छोड़ जाते हैं वह खुद भी बड़े गुनाहगार होते हैं और दूसरों को भी करते हैं और बजाये सवाब के अज़ाब पाते हैं और दूसरों के लिये अज़ाब बनते हैं।
और बहुत ज़ल्दी ज़ल्दी तेजी के साथ ग़लत सलत कुरआने करीम पढ़ने वाले या फ़ासिक़ व फ़ाजिर वे नमाज़ी, आवारा मिज़ाज, आज़ाद ख़्याल हाफिज़ के पीछे तरावीह की नमाज़ अदा करने और कुरआन सुनने से बेहतर है कि सही तिलावत करने वाले दीनदार के पीछे तीसवें पारे की आख़री दस सूरतों से नमाज़ अदा कर ली जाये जैसा कि बहुत सी जगह इसका रिवाज़ है।
हर रकअत में “कुलहोवल्लाह" शरीफ़ की तिलावत करके भी तरावीह की नमाज़ अदा करना मारूफ है और जाइज़ है। जैसा के फतावा आलगीरी मे है।
इसी में है और हमारे ज़माने मे अफ़ज़ल यह है कि क़िरत इतनी ही पढ़ी जाये कि जिस से लोग जमाअत से घबरा न जायें क्योंकि जमाअत में ज़्यादा लोगों का शरीक होना लम्बी किरत से बेहतर है और इमाम को चाहिये कि जब ख़त्म का इरादा करे तो सत्ताईसवीं शब में ख़त्म करे कुरआन के ख़त्म में ज़ल्दी करके इक्कीसवीं तारीख़ या इससे पहले ख़त्म करना मकरूह है।
*📚 फ़तावा आलमगीरी जिल्द अव्वल सफ़हा 118*
हाँ अगर सही तौर पर कुरआन की तिलावत करने वाला इमामत का अहल हाफिज़े कुरआन दस्तयाब हो तो एक बार पूरे रमज़ान में तरावीह की नमाज़ में ख़त्मे कुरआन सुन्नत है बगैर किसी ख़ास शरअई वजह के सिर्फ आराम तलबी की वजह से इस को छोड़ना सही नहीं है। आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा अलैहिर्रहमा बरेलवी फरमाते हैं।
🖌कौम की सुस्ती की वजह से एक कुरआने अज़ीम का ख़त्म नहीं छोड़ा जायेगा क्योंकि यह सुन्नत है और जो इस से ज़ाईद है वह छोड़ दिया जायेगा क्योंकि यह फ़ितना है।
*📚 फतावा रज़विया जिल्द 7 सफहा 468मतबुआ लाहौर*
तरावीह की नमाज़ की कज़ा नहीं है। अगर किसी दिन की तरावीह रह गई तो दूसरे दिन उस की कज़ा नही की जा सकती हां तरावीह का वक़्त इशा की नमाज़ के बाद से लेकर सुबह सादिक़ तक है यानि सहरी के वक़्त ख़त्म होने से पहले जब भी पढ़े वह अदा है कज़ा नहीं।
📌जिसने फर्ज़ जमाअत से न पढ़े हों वह वितर की जमाअत में शरीक न हो तनहा पढ़े । हा तरावीह की जमाअत में शरीक हो सकता है।
🖌हज़रत मौलाना मुफ्ती अजमल शाह साहब सम्भली रहमतुल्लाह तआला अलैह लिखते हैं।
⚡️जिस मस्जिद में नीचे सेहन न हो, या कम हो और गर्मी या गर्मी के मौसम में नीचे सख़्त गर्मी मालूम होती हो और छत पर ऐसी चहार दीवारी हो जिससे किसी मकान की बेपर्दगी न होती हो तो उस ज़रूरत की बिना पर गर्मी के औक़ात में मस्जिद की छत पर नमाज़ पढ़ी जा सकती है।
*📚 फतावा अजमलिया,जिल्द 2, सफहा 395*
*📚रमज़ान का तोहफ़ा सफ़हा 16,17*
*✍️मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी*
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