सहरी व इफ़तार के मुताल्लिक़ बातें
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*🥀 सहरी व इफ़तार के मुताल्लिक़ बातें 🥀*
*पोस्ट- 13*
✏️ सहरी खाना और रोज़े की इफ़्तार करना सुन्नत है और इनमे बड़ा सवाब ख़ैर व बरकत और अल्लाह तआला की रहमत है। सहरी में ताख़ीर और इफ्तार में ज़ल्दी करना सुन्नत है लेकिन ऐसी ताख़ीर या ज़ल्दी न की जाये कि रोज़े में शक पैदा हो जाये।
==>खजूर या फिर छुआरे से इफ़तार करने में सबसे ज़्यादा सवाब है यह न हो तो पानी बेहतर है सहरी खाना और इफ़तार करना सुन्नत है अगर कोई शख़्स सहरी न खाये इफ्तार भी न करे ऐसे ही रोज़े रख ले तब भी रोज़ा हो जायेगा लेकिन इस को सुन्नत का सवाब नहीं मिलेगा सफ़र वगैरह मे देखा गया है कि कुछ लोग इफ़तार के वक़्त खाने पीने की चीज़ हासिल करने के लिये दौड़ते भागते और परेशान से नज़र आते हैं और इनके अमल से ऐसा महसूस होता है कि वह समझते हैं अगर इफ़तार न कर सके या इफ़तार मे ताख़ीर हो गई हो तो रोज़ा न होगा हालांकि ऐसी कोई परेशान होने की बात नहीं अगर किसी मज़बूरी व परेशानी की वजह से इफ़तार न कर सका या इस में ताख़ीर हो गई तब तो कोई परेशान होने की बात ही नही है बे वजह जानबूझ कर इफ़तार न करे तब भी रोज़ा ख़राब न होगा हां ऐसा करना सुन्नत के सवाब से महरुमी और मकरूह है हां अगर सुन्नत की अदायगी की वजह से वह इफ़तार का सामान तलाश करने के लिये पेरशान होते हैं तो यह बड़ी अच्छी बात है। इफ़तार का बेहतर तरीक़ा यह है कि कुछ खजूर खा ले या पानी पी कर या खाने पीने की कोई और मामूली सी चीज़ ज़ल्दी खा पी कर मग़रिब की नमाज़ जमाअत से अदा की जाये जो लोग इफ़तार के वक़्त खाने पीने में लगे रहते हैं और सिर्फ़ इस वजह से मगरिब की जमाअत छोड़ देते हैं बजाये सवाब पाने के गुनाहगार होते हैं इफ़तार इतनी ही होना चाहिये कि नमाज़ की पहली तकबीर भी छूटने न पाये।
==>जहां लोग घरों से इफ़तार करके आते हों वहां इनके इन्तिज़ार में मग़रिब की जमाअत कायम करने में मामूली और हल्की दो चार मिनट की ताख़ीर कर दी जाये तो कुछ हर्ज़ नहीं लेकिन मग़रिब की नमाज़ में इतनी ताख़ीर कि तारे खूब चमकने लगें यह मकरूह है। इफ़तार की दुआ यह है।
ऐ अल्लाह मैने तेरी इबादत के लिये रोज़ा रखा और तेरे दिये हुए रिज़्क से इफ़तार की
⚡️जो अरबी के कलमात अदा न कर सके वह उर्दू वगैरह मे भी 'दुआ पढ़ सकता है। सही यह है कि इफ़तार की दुआ रोज़ा इफ़तार करने के बाद पढ़ी जाये अगर कोई शख्स पहले पढ़े तो उसको समझा दिया जाये लेकिन इस क़िस्म के मसाईल में आम लोगों को बहस व मुबाहिसे में नहीं पड़ना चाहिये।
*📚रमज़ान का तोहफ़ा सफ़हा 18,19,20*
*✍️मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी*
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