ईद से मुताल्लिक कुछ बाते
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*🥀 ईद से मुताल्लिक कुछ बाते 🥀*
✏️ ईद इस्लामी त्यौहार है और इस दिन कुदरती तौर पर हर मुसलमान को फितरी खुशी हासिल होती है और यह अल्लाह तआला - का खुसूसी करम है कि उसने बनाम इस्लाम मुसलमानों को जो मज़हब अता फरमाया उसमें इन्सानी फ़ितरत के तकाज़ों से महरूम नहीं रखा गया खुशी मनाना खुश रहना इन्सानी फितरत है बल्कि एक हदीस का मफहूम है कि मोमिन मोमिन से मुस्कराकर हँसमुख चेहरे के साथ मुलाकात करता है तो इसमें भी उसको सवाब मिलता है।
और ईद एक ऐसा त्यौहार है कि इसमें बस्ती से बाहर जाकर खुले आसमान के नीचे अल्लाह तआला की इबादत भी होती है और त्यौहार की खुशी भी। हदीस में आया है कि रमज़ान के रोज़े रखकर कुछ बन्दगाने खुदा ईदगाह में ईद की नमाज़ पढ़ने के लिये जमा होते हैं और वह जब घरों को लौटते हैं इससे पहले उनके सारे गुनाह माफ कर दिये जाते हैं और उनकी बख्शिश और मगफिरत का ऐलान फ़रिश्तों में कर दिया जाता है।
ईद की नमाज़ ईदगाह में पढ़ना सुन्नत है लेकिन मस्जिद में भी जायज़ है ईद के दिन मिसवाक करना, गुस्ल करना, खुश्बू लगाना, ईदगाह को एक रास्ते से जाना और दूसरे रास्ते से वापस आना सुन्नत है ईदगाह को जाये तो यह ज़िक्र करते हुये जायें और यही पढ़ते हुये आयें।
अल्लाह बड़ा है, अल्लाह बड़ा है, अल्लाह के अलावा कोई माबूद नहीं, और अल्लाह बड़ा है, अल्लाह बड़ा है, और अल्लाह ही के लिये सारी तारीफें हैं।
ईद के दिन लोगों से खुश होकर खिले चेहरे से मिलना चाहिये। अगर कोई गुम भी हो तो उसको चेहरे से जाहिर न होने दें।
ईद-उल-फितर की नमाज़ के लिये निकलने से पहले कुछ खा पी लें ख़ासकर कोई मीठी चीज़ और अगर चन्द छुआरे या खजूरे खा ली जाये तो सबसे बेहतर अफ जल और सुन्नत है । ईद-उल-फितर की नमाज़ से पहले सदका-ए-फितर निकालना हर साहिबे निसाब पर अपनी और अपने अयाल में से हर एक की तरफ से वाजिब है जिसकी मिकदार ज़्यादा सही तहकीक के मुताबिक *2 किलो 45 ग्राम गेहूँ* या उनकी कीमत के पैसे या कोई और जिन्स। जब ईदगाह या मस्जिद में ईद की नमाज़ पढ़ने जायें तो ईद की नमाज़ से पहले वहाँ कोई और नमाज़ न पढ़े यह गलत है हदीस पाक में इससे मना किया गया है चाहे वह कोई कजा नमाज़ हो या नफिल!
मस्जिदों और ईदगाहों में भीख मांगने वालों अपनी ज़ात के लिये सवाल करने वालों को न आने दें और न उन्हें सफ़हों में घूमने दें और न ही किसी भिखारी को भीख का ऐलान करने दें। दीनी तहरीकों और उनके चन्दों और तकरीरों की भी एक हद होना चाहिये ईदगाहों में उनकी ज्यादती अच्छी नहीं ऐसा न हो कि नमाज़े ईद कम जरूरी और यह काम ज़्यादा ज़रूरी होकर रह जायें जो जगह जिस काम के लिये बनी है वहाँ ज़्यादा जोर ध्यान और तवज्जो उसी काम की तरफ होना चाहिये और अवाम को इतनी ज़्यादा देर नहीं रोकना चाहिये कि वह परेशान हो जायें या लोगों को दोबारा वुज़ू करने की जरूरत पड़ने लगे ईद की नमाज़ के बाद इमाम के लिये खुत्वा देना और नमाज़ियों को इसका सुनना सुन्नत है लेकिन ज्यादा लम्बा खुत्बा न पढ़ा जाये खुत्वे के बाद मुख्तसर दुआ मांगना भी जायज़ व मुस्तहब है ईद की नमाज़ के बाद मुसलमान आपस में मुसाफे व मुआनके करते हैं एक दूसरे से गले मिलते हैं यह भी जायज़ है। जो लोग इसे नाजाइज़ बिदअत कहते हैं वह गलती पर हैं।
*📚रमज़ान का तोहफ़ा सफ़हा 35,36,37*
*✍️मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी*
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