उजरते तरावीह़ की जाइज़ स़ूरतें

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*🥀 उजरते तरावीह़ की जाइज़ स़ूरतें 🥀*



ख़लीफ़ए अअ़्ला ह़ज़रत, ह़ुज़ूर स़दरुश् शरीअ़ह, बदरुत़् त़रीक़ह, ह़ज़रत अ़ल्लामह मुफ़्ती अमजद अ़ली अअ़्ज़मी علیہ الرحمہ फ़रमाते हैं हाँ (तरावीह़ पढ़ाने वाला या तरावीह़ पढ़वाने वाले) अगर कह दें कि कुछ नहीं दूँगा या नहीं लूँगा फिर पढ़े और ह़ाफ़िज़ की ख़िदमत करें तो इस में ह़रज नहीं कि اَلصَّرِیۡحُ یُفَوِّقُ الدَّلَالَۃَ (यअ़्नी स़राह़त  को दलालत पर फ़ौक़ियत है) 
*📚 बहारे शरीअ़त, जिल्द,1 ह़िस़्स़ह,4 पेज,692*

शैख़ुल ह़दीस वत्-तफ़सीर, ह़ज़रत अ़ल्लामह मुफ़्ती मुह़म्मद क़ासिम क़ादिरी अ़त़्त़ारी स़ाह़ब क़िब्लह دامت برکاتہم العالیہ फ़रमाते हैं *अगर कोई चाहता है कि गुनाह भी न हो और उजरत (मज़दूरी) भी जाइज़ हो जाए, तो इस की दर्जे ज़ैल दो स़ूरतें हो सकती हैं*

❶ एक स़ूरत येह है कि तरावीह़ पढ़ाने वाला वाज़ेह़ (स़ाफ़) त़ौर पर कह दे कि कुछ नहीं लूँगा या कमेटी वाले कह दें कि कुछ नहीं देंगे, फिर ख़त्मे क़ुरआन पर कुछ न कुछ ख़िदमत कर दें, तो येह जाइज़ है।

❷ दूसरी स़ूरत येह है कि तरावीह़ पढ़ाने वाले को दो या तीन घण्टे के लिये अजीर (उजरत पर काम करने वाला, मुलाज़िम, मज़दूर) रख लिया जाए और उतनी देर के लिए उस की कोई तन्ख़्वाह मुक़र्रर कर दी जाए,

*मसलन (उदाहरण Example):*
मस्जिदे इन्तिज़ामियह (मस्जिद के ज़िम्मा दारान, कमेटी के लोग) तरावीह़ पढ़ाने वाले से कहें कि हमने आप को एक माह के लिए रोज़ाना तीन घण्टे फ़ुलां वक़्त से फ़ुलां वक़्त तक के लिए इतनी उजरत (मज़दूरी) पर अजीर रखा, इस में हम जो चाहें आप के मन्स़ब के मुत़ाबिक़ आप से काम लेंगे, वोह कहे मैंने क़ुबूल किया।

अब तरावीह़ पढ़ाने वाला उतनी देर के लिये उन का अजीर हो गया, उस के बअ़्द वोह उस ह़ाफ़िज़ स़ाह़ब को तरावीह़ की नमाज़ पढ़ाने का कह दें, तो इस स़ूरत में उजरत लेना देना जाइज़ हो जाएगा।

शरई़ कौंसिल ऑफ़ इण्डिया बरेली शरीफ़ (पहला फ़िक़्ही सेमिनार 17 रजह 1425 हिज्री / 3 सितम्बर 2004 ई़स्वी) मौज़ूअ़् नम्बर 3, इजारए तरावीह़ में है

❶ अस़्ल मज़हब के मुत़ाबिक़ तरावीह़ में तिलावते क़ुरआन पर उजरत लेना देना नाजइज़ व ह़राम है। ख़्वाह उजरत मअ़्लूम हो या मजहूल, हाँ येह स़ूरत अपनाई जाए कि तरावीह़ पढ़वाने वाले, पढ़ने वाले ह़ुफ़्फ़ाज़ को मुअ़य्यने वक़्त और मुअ़य्यने उजरत पर अजीर रखलें,
मसलन (उदाहरण) येह कहें कि 7 बजे शाम से 11 बजे रात तक इतने दिनों के लिए 5 हज़ार रुपये पर आप को इजारह में लिया और ह़ाफ़िज़ कहे कि मैंने क़ुबूल किया और ह़ाफ़िज़ से तरावीह़ पढ़वा कर उसे मुक़र्ररह उजरत दी जाए। उसके बअ़्द कुछ लोग अपने त़ौर पर नज़राना देना चाहें तो दे सकते हैं इसमें ह़रज नहीं बल्कि सवाब है।

❷ मस्जिद के मुअ़य्यन इमाम को भी फ़र्ज़े इ़शा के बअ़्द मसलन 9 बजे से 11 बजे रात तक बत़ौरे अजीर मुक़र्रर किया जाए फिर उन से तरावीह़ पढ़वाई जाए तो जाइज़ है इस त़रह़ वक़्ते ख़ास़ की जो उजरत त़य होगी मुअ़य्यन इमाम के लिए लेना जाइज़ होगा।

❸ मज़कूरह बाला ह़ुक्म ह़ाफ़िज़, सामेअ़् (जो लुक़्मह देने के लुए मुक़र्रर किए जाते हैं उन) के लिए भी है।



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