एअ़्तिकाफ़ की क़िस्में और उनके अह़काम

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*🥀 एअ़्तिकाफ़ की क़िस्में और उनके अह़काम 🥀*



🔛 एअ़्तिकाफ़ की तीन क़िस्में हैं
1) *वाजिब,* कि एअ़्तिकाफ़ की मिन्नत मानी यअ़्नी ज़बान से कहा, मह़्ज़ दिल में इरादह से वाजिब न होगा 
2) *सुन्नते मुअक्कदह,* कि रमज़ान के पूरे अ़शरए अख़ीरह यअ़्नी आख़िर के दस दिन में एअ़्तिकाफ़ किया जाए यअ़्नी *बीसवीं रमज़ान को सूरज डूबते वक़्त ब-निय्यते एअ़्तिकाफ़ मस्जिद में हो और तीस्वीं के ग़ुरूब के बअ़्द या उन्तीस को चाँद होने के बअ़्द निकले* अगर बीसवीं तारीख़ को बअ़्दे नमाज़े मग़रिब निय्यते एअ़्तिकाफ़ की तो सुन्नते मुअक्कदह अदा न हुई और येह एअ़्तिकाफ़ सुन्नते किफ़ायह है कि अगर सब तर्क करें तो सब से मुत़ालबह होगा और *शहर में* एक ने कर लिया तो सब बरीउज़्ज़िम्मह - 3) इन दो ते अ़लावह और जो एअ़्तिकाफ़ किया जाए वोह मुस्तह़ब व सुन्नते ग़ैर मुअक्कदह है 
*📚 बहारे शरीअ़त, जिल्द 1, ह़िस़्स़ह 5, पेज 1021, मस्अलह 7*

1️⃣ *एअ़्तिकाफ़े मुस्तह़ब का ह़ुक्म:*
एअ़्तिकाफ़े मुस्तह़ब के लिए न रोज़ह शर्त़ है, न इसके लिए कोई ख़ास़ वक़्त मुक़र्रर, बल्कि जब मस्जिद में एअ़्तिकाफ़ की निय्यत की, जब तक मस्जिद में है मोअ़्तकिफ़ है, चला आया एअ़्तिकाफ़ ख़त्म हो गया - येह बिग़ैर मेह़नत सवाब मिल रहा है कि फ़क़त़ (स़िर्फ़) निय्यत कर लेने से एअ़्तिकाफ़ का सवाब मिलता है, इसे तो न खोना चाहिए - मस्जिद में अगर दरवाज़ह पर येह इ़बारत लिख दी जाए कि एअ़्तिकाफ़ की निय्यत करलो, एअ़्तिकाफ़ का सवाब पाओगे तो बेहतर है कि जो इससे ना-वाक़िफ़ हैं उन्हें मअ़्लूम हो जाए और जो जानते हैं उनके लिए याद दहानी हो 
*📚 बहारे शरीअ़त, जिल्द 1, ह़िस़्स़ह 5, पेज 1021, मस्अलह 8*

2️⃣ *एअ़्तिकाफ़े सुन्नत का ह़ुक्म:*
एअ़्तिकाफ़े सुन्नत यअ़्नी रमज़ान शरीफ़ की पिछली दस तारीख़ों में जो किया जाता है, उस में रोज़ह शर्त़ है, लिहाज़ा अगर किसी मरीज़ या मुसाफ़िर ने एअ़्तिकाफ़ तो किया मगर रोज़ह न रखा तो सुन्नत अदा न हुई बल्कि नफ़्ल हुवा 
*📚 बहारे शरीअ़त, एअ़्तिकाफ़ का बयान, मस्अलह 9*

3️⃣ *एअ़्तिकाफ़े वाजिब की ह़ुक्म:*
एअ़्तिकाफ़े वाजिब में भी रोज़ह शर्त़ है, यहाँ तक कि अगर एक महीने के एअ़्तिकाफ़ की मिन्नत मानी और येह कहा कि रोज़ह न रखेगा जब भी रोज़ह रखना वाजिब है और अगर रात के एअ़्तिकाफ़ की मिन्नत मानी तो येह मिन्नत स़ह़ीह़ नहीं कि रात में रोज़ह नहीं हो सकता और अगर यूँ कहा कि एक दिन रात का मुझ पर एअ़्तिकाफ़ है तो येह मिन्नत स़ह़ीह़ है और अगर आज के एअ़्तिकाफ़ की मिन्नत मानी और खाना खा चुका है तो मिन्नत स़ह़ीह़ नहीं - यूँही अगर ज़ह़वए कुबरा के बअ़्द मिन्नत मानी और रोज़ह न था तो येह मिन्नत स़ही़ह़ नहीं कि अब रोज़ह की निय्यत नहीं कर सकता, बल्कि अगर रोज़ह की निय्यत कर सकता हो मस्लन ज़ह़वए कुबरा से क़ब्ल जब भी मिन्नत स़ह़ीह़ नहीं कि येह रोज़ह नफ़्ल होगा और इस एअ़्तिकाफ़ में रोज़ए वाजिब दरकार 
*📚 बहारे शरीअ़त, एअ़्तिकाफ़ का बयान, मस्अलह 19*



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