फ़तहे_मक्का

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*🥀 फतहे_मक्का 🥀*



*👉 पोस्ट 1*
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🔛 मक्के में अबू सुफियान बहुत बेचैन थे,"आज कुछ होने वाला है"( वो बड़बड़ाया) उनकी नज़र आसमान की तरफ बार बार उठ रही थी उनकी बीवी"हिन्दा" जिसने हज़रत अमीर हम्ज़ा रदिअल्लाहु तआला अन्हु का कलेजा चबाया था उसकी परेशानी देखकर उनके पास आ गई थी, क्या बात है क्यूं परेशान हो। हूं अबू सुफियान चौंके कुछ नहीं तबीयत घबरा रही है मैं ज़रा घूम कर आता हूं, वो ये कहकर घर के बैरूनी दरवाज़े से बाहर निकल गए मक्के की गलियों में घूमते घूमते वो उसकी हद तक पहुंच गए, अचानक उनकी नज़र शहर से बाहर एक वसी(बड़े) मैदान पर पड़ी, हज़ारों मशालें रौशन थीं, लोगों की चहल पहल उनकी रौशनी में नज़र आ रही थीं और भिनभिनाहट की आवाज़ थी जैसे सैकड़ों लोग धीमी आवाज़ में कुछ पढ़ रहे हों उनका दिल धक से रह गया था उन्होने फ़ैसला किया कि वो क़रीब जाकर देखेंगे कि ये कौन लोग हैं, इतना तो वो समझ ही चुके थे कि मक्के के लोग तो ग़ाफीलों की नींद सो रहे हैं और ये लश्कर यक़ीनन मक्के पर चढ़ाई के लिए ही आया है
वो जानना चाहते थे कि ये कौन हैं
वो आहिस्ता आहिस्ता उस लश्कर के काफी क़रीब पहुंच चुके थे,
कुछ लोगों को पहचान लिया था, ये उनके अपने ही लोग थे जो मुसलमान हो चुके थे और मदीना हिजरत कर चुके थे,उनका दिल डूब रहा था, वो समझ गए थे कि ये लश्कर मुसलमानों का है,
      
और यक़ीनन" मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم" अपने जां निसारों के साथ मक्का आ पहुंचे थे वो छुप कर हालात का जायज़ा ले ही रहे थे कि अचानक से किसी ने उनकी गरदन पर तलवार रख दी, उन्की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे रह गयी थी, लश्कर के पहरेदारों ने उने पकड़ लिया था, और अब उने बारगाहे मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में लेजा रहे थे, उनका एक एक क़दम कई मन का हो चुका था, हर क़दम पर उन्हे अपनी करतूत याद आ रही थी, जंगे बद्र, उहद, खन्दक, सब उनकी आंखों के सामने नाच रही थीं, उन्हे याद आ रहा था कि हमने कैसे सरदाराने मक्का को इकट्ठा किया था "मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को क़त्ल करने के लिए" कैसे नज्जाशी के दरबार में अपने लोग भेजे थे 
ये मुसलमान हमारे गुलाम और बाग़ी हैं इनको हमें वापस दो,
कैसे उनकी बीवी हिन्दा ने अमीर हमज़ा रदिअल्लाहु तआला अन्हु को अपने ग़ुलाम हब्शी के ज़रिए शहीद करवा कर उनका सीना चाक करके उनका कलेजा निकाल कर चबाया और नाक और कान काट कर गले में हार बना कर डाले थे,और अब हमें उन्ही मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के सामने पेश किया जा रहा था उने यक़ीन था कि उनकी रिवायात के मुताबिक़ हम जैसे "दहशतगर्द" को फौरन कत्ल कर दिया जाएगा।

#इधर-
बारगाहे रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में असहाब जमा थे और सुबह के इक़दामात के बारे में मशावरत चल रही थी कि किसी ने आकर अबू सुफियान की गिरफ्तारी की खबर दे दी "अल्लाहु अकबर" खैमा में नारा ए तकबीर बलंद हुआ अबू सुफियान की गिरफ्तारी एक बहुत बड़ी खबर और कामयाबी थी, खैमे में मौजूद उमर इब्ने ख़त्ताब रदिअल्लाहु तआला अन्हु उठ कर खड़े हुए और तलवार को म्यान से निकाल कर इंतिहाई जोश के आलम में बोले
उस बदबख्त को क़त्ल कर देना चाहिए शुरू से सारे फसाद की जड़ यही रहा है, चेहरा ए मुबारक रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर तबस्सुम नमूदार हुआ, और उनकी दिलों में उतरती हुई आवाज़ गूंजती
" बैठ जाओ उमर- उसे आने दो"
उमर इब्ने खत्ताब आंखों में गैज़ लिए हुक्मे रसूल صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की इताअत में बैठ तो गए लेकिन उनके चेहरे की सुर्खी बता रही थी कि उनका बस चलता तो अबू सुफियान के टुकड़े टुकड़े कर डालते इतने में पहरेदारों ने बारगाहे रिसालत صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में हाज़िर होने की इजाज़त चाही, इजाज़त मिलने पर अबू सुफियान को रहमतुल्लिल आलमीनﷺ के सामने इस हाल में पेश किया गया कि उनके हाथ उनके अमामे से उनकी पुश्त पर बंधे हुए थे, चेहरे की रंगत पीली पड़ चुकी थी,और उनकी आंखों में मौत के साए लहरा रहे थे,
लबहाए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को जुंबिश हुई और असहाब किराम رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہم ने एक अजीब जुमला सुना
इनके हाथ खोल दो, और इनको पानी पिलाओ, बैठ जाओ अबू सुफियान-!!
      अबू सुफियान हारे हुए जुवारी की तरह गिरने के अंदाज़ में खैमा के फर्श पर बिछे कालीन पर बैठ गए- पानी पीकर उनको कुछ हौसला हुआ तो नज़र उठाकर खैमे में मौजूद लोगों की तरफ देखा,उमर इब्ने खत्ताब की आंखें ग़ुस्से से सुर्ख थीं, अबूबक्र इब्ने क़ुहाफा की आंखों में उनके लिए अफ़सोस का तास्सुर था, उस्मान बिन अफ्फान के चेहरे पर अज़ीज़दारी की हमदर्दी और अफ़सोस का मिला जुला तास्सुर था अली इब्न अबी तालिब रदिअल्लाहु तआला अन्हु का चेहरा सपाट था, इसी तरह बाक़ी तमाम असहाब के चेहरों को देखते देखते आखिर उनकी नज़र मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के चेहरे मुबारक पर आकर ठहर गई, जहां जलालत व रहमत के खूबसूरत इम्तिज़ाज (मिलावट) के साथ कायनात की खूबसूरत तरीन मुस्कुराहट थी,
            कहो अबू सुफियान कैसे आना हुआ
अबू सुफियान के गले में जैसे आवाज़ ही नहीं रही थी, बहुत हिम्मत करके बोले मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं
उमर इब्न खत्ताब एक बार फिर उठ खड़े हुए " या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم " ये शख्स मक्कारी कर रहा है, जान बचाने के लिए इस्लाम क़ुबूल करना चाहता है, मुझे इजाज़त दीजिए, मैं आज इस दुश्मने अज़ली का खात्मा कर ही दूं, उनके मुंह से कफ जारी था
 बैठ जाओ उमर- रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने नरमी से फिर फ़रमाया: बोलो अबू सुफियान क्या तुम वाक़ई इस्लाम क़ुबूल करना चाहते हो
जी या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं मैं समझ गया हूं कि आप और आपका दीन भी सच्चा है और आपका ख़ुदा भी सच्चा है, उनका वादा पूरा हुआ मैं जान गया हूं कि सुबह मक्का को फ़तह होने से कोई नहीं बचा सकेगा।          

कल इसके आगे.........
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