क्या आपकी तरावीह़ का नज़राना ह़लाल है

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*🥀 क्या आपकी तरावीह़ का नज़राना ह़लाल है 🥀*



🔛 रमज़ानुल मुबारक के महीने में जहाँ बहुत सारी बुराइयां अ़वाम करती है, वहीं ख़वास़ भी कई बुराइयों के मुर्तकिब होते हैं, *मस्लन:* फ़र्ज़ी रसीदों से चन्दे, ग़लत़ सलत़ कलामे पाक सुनाना, तरावीह़ का खेल बनाना वग़ैरह, *उन्हीं में एक मस्अलह तरावीह़ के नज़राने का है,* जो ह़ज़रात दूसरी जगह क़ुरआन शरीफ़ सुनाने जाते हैं और कलामे पाक सुनाने का नज़राना मु-तअ़य्यन करते हैं, वोह लोग नाजाइज़ काम करते हैं और उनका नज़राना भी *ह़राम* होता है, लेने वाले और देने वाले दोनों गुनहगार होते हैं इस लिए कि *त़ाअ़त व इ़बादत पर उजरत मु-तअ़य्यन करना ह़राम है*

*सय्यिदी अअ़्ला ह़ज़रत علیہ الرحمہ फ़तावा रज़विय्यह शरीफ़ में फ़रमाते हैं* अस़्ल येह है कि त़ाअ़त व इ़बादात पर उजरत लेना देना (सिवाए तअ़्लीमे क़ुरआने अ़ज़ीम व उ़लूमे दीन व अज़ान व इमामत वग़ैरहा मअ़्दूदे चन्द (गिन्ती के, बहुत कम) अश्या कि जिन पर इजारह करना मु-तअख़्ख़िरीन ने बिना चारी व मजबूरी ब-नज़रे ह़ाले ज़माना जाइज़ रखा) मुत़लक़न ह़राम है 
*📚 जिल्द,9, पेज,159, क़दीम*

और इजारह जिस त़रह़ ज़बान से होता है इसी त़रह़ उ़र्फ़ और माह़ौल से भी हो जाता है, 
*मस्लन:* तरावीह़ सुनाने और सुनने वालों ने ज़बान से कुछ नहीं कहा मगर मअ़्लूम है कि नज़राना देना होगा, और सुनाने वाला जानता है कि कुछ न कुछ तो ज़रूर मिलेगा, उन्होंने इस त़रह़ सुनाया और लोगों ने इस निय्यत से सुना तो इजारह हो गया और अब दो ह़राम हो गए, एक तो इ़बादत पर इजारह येह ह़राम काम और दूसरा ह़राम येह कि उजरत अगर उ़र्फ़न मुअ़य्यन नहीं तो इसके ना मअ़्लूम होने से इजारह फ़ासिद 
*📚 मुलख़्ख़स़ फ़तावा रज़विय्यह, जिल्द,8, पेज,159, क़दीम*

अब ज़रा ग़ौर करें कि किस त़रह़ हम लोगों ने ह़राम काम को रिवाज दे रखा है बल्कि माह़ौल येह बना रखा है कि *ह़िफ़्ज़ की पहली निय्यत येह करवाते हैं कि आप को तरावीह़ सुनाना है और नज़रानह पाना है,* नज़राना लेना कोई ग़लत़ बात नहीं मगर ह़राम त़रीक़े से लेना ज़रूर ह़राम है लिहाज़ा क़ुरआन सुनाने वाले ह़ज़रात इस पर तवज्जह दें और ह़लाल व दुरुस्त त़रीक़े से नज़रानह वस़ूल करें اِن شآء الله (अगर अल्लाह ने चाहा) अगली तह़रीर में हम कई ऐसे त़रीक़े बताएंगे कि जिनसे न स़िर्फ़ आप का नज़राना लेना ह़लाल होगा बल्कि देने वाले पर भी कोई वबाल न होगा, इस लिए फ़क़ीर पर कोई भी ह़ुक्म लगाने से पहले अगली तह़रीर का इन्तिज़ार करें।


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