हीला ए शरई़ और मदारिस
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*🥀 हीला ए शरई़ और मदारिस 🥀*
🔛 "हीला" का माना होता है तदबीर, चाल और बहाना वगै़रह और "शरई़" ये शरअ़ से मनसूब है यानी जो शरीअ़त के ह़ुक्म के मुताबिक़ हो, शरीअ़त के दायरे में रहकर गुनाह व हराम से बचते हुए ह़लाल को तलब करने को हीला ए शरई कहते हैं ज़रूरत के वक़्त ये हीला करना जायज़ है इसका ज़िक्र क़ुरआन व ह़दीस मे मौजूद है क़ुरआने मुक़द्दस में अल्लाह पाक ने इरशाद फरमाया :
*وَخُذْ بِیَدِكَ ضِغثاً فَاضْرِب بِّهِ وَلَا تَحْنَثْ°*
"तु अपने हाथ में एक झाड़ू लेकर उसको मार दे और अपनी क़सम ना तोड़"
*📚 सूरह स्वाद 38 आयत न 44*
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तफसीर मे वाक़िया कुछ यूं है कि हज़रते अय्यूब अलैहिस्सलाम जब सख्त बीमार थे तो एक मर्तबा हज़रत ने अपनी नेक बीवी को आवाज़ दी मगर उन्हें आने में कुछ देर हो गयी जिस पर आप नाराज़ हो गए और ये क़सम खा बैठे कि जब मैं अच्छा हो जाऊंगा तो तुझे लकड़ियों से मारूंगा, फुक़्हा आपकी नाराज़गी की दो वजह फरमाते हैं पहली ये कि हो सकता है कि बीमारी की वजह से आपके मिज़ाज में सख्ती आ गयी हो और दूसरी ये कि शैतान त़बीब की सूरत में आपकी बीवी के पास आया और उनको दवा देकर बोला कि इसे अपने शौहर को खिला देना और जब वो अच्छे हो जायें तो मेरा शुक्रिया अदा करना उन्होंने मामूली बात समझकर दवा ले ली मगर जब ये बात उन्होंने हज़रते अय्यूब अलैहिस्सलाम को बताई तो आप समझ गए कि शैतान इनको इम्तिहान में कामयाब होते नहीं देख पा रहा है इसीलिए इधर उधर के तीर चला रहा है, आपको अपनी बीवी की इसी बात पर गुस्सा आ गया जिस पर आपने क़सम खा ली, फिर अल्लाह ने जब आपको शिफा दी तो अब उस क़सम को पूरी करने की फिक्र हुई और सोचने लगे कि जिसने मेरी इतनी खातिर की मैं उसे कैसे मारूं तब अल्लाह ने हज़रते जिब्रील अलैहिस्सलाम को उनके पास भेजा और ये हीला बताया कि झाड़ू भी लकड़ी के तिनकों से ही बनी होती है तो आप उन्हें झाड़ू से हलके से मार दीजिए आपकी क़सम भी पूरी हो जाएगी और उन्हें तकलीफ भी नहीं होगी।
*📚 तज़किरतुल अम्बिया, सफह न 191*
एक मौके पर हज़रते सारह व हज़रते हा़जिरा में किसी बात पर अनबन हो गयी और हज़रते सारह ने ये क़सम खा ली कि अगर मैं क़ाबू पाऊंगी तो तुम्हारा कोई उज़्व (बदन का हिस्सा) काटूगीं, अल्लाह ने हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर वही भेजी कि दोनों में सुलह करा दो आपने सुलह तो करा दी पर हज़रते सारह फरमाती हैं कि मैंने जो क़सम खाई उसका क्या हीला होगा? तब अल्लाह ने हज़रते इब्राहिम अलैहिस्सलाम पर वही के ज़रिए हज़रते सारह को हज़रते हाजिरा के कान छेदने का हुक्म दिया ऐैसा करने से हज़रते सारह की क़सम भी पूरी हो गई और हज़रते हाजिरा को तकलीफ भी नहीं हुई, औरतों के कान छेदने की शुरुआ़त यहीं से हुई इस पर यही दलील भी है।
*📚 जाअल हक़ हिस्सा 1, सफह न 366*
हदीस शरीफ में है एक बार रसूले अकरम ﷺ घर में दाखिल हुए तो देखा कि चूल्हे पर गोश्त की हान्ढी जोश मार रही है, घर वालों ने रोटी और कोई दूसरा सालन हुज़ूर ﷺ की खिदमत में पेश किया आपने फरमाया क्या मैं गोश्त की खौलती हन्ढिया नहीं देख रहा हूँ, घर वालों ने कहा हुज़ूर! वो हमारी कनीज़ बरीरह को किसी ने सदके़ का गोश्त दिया था और आप सदक़ा नहीं खाते हैं आप ने फरमाया "हां वो सदके़ का गोश्त ज़रूर था लेकिन बरीरह जो सदक़ा लेने की अहल है जब उसने क़बूल कर लिया और अब अगर वो अपनी तरफ से हमको दे तो वो हमारे लिए हदया होगा।"
*📚 मिश्कातुल मसाबीह जिल्द 1 सफह न 338*
इस हदीस शरीफ से अइम्मए आ़लाम उ़लमाए किराम ने ये का़यदा साबित किया कि क़ब्ज़ा बदल जाने से माल का ह़ुक्म बदल जाता है सदके़ का गोश्त जब तक बरीरह के क़ब्ज़े में नहीं आया था उसका ह़ुक्म यही था कि वो सदके़ का माल है लेकिन जब बरीरह ने वुसूल कर लिया तो अब वो उसकी मालिक बन गयीं और जब मालिक हो गयीं तो वो अपनी तरफ से जिसको बतौरे तुह़फा दें उसका लेना भी जाइज़ और खाना भी जाइज़ अगरचे मालदार ही क्यों ना हो
यही वो हीला है जिसे मदारिस के जि़म्मेदार मजबूरन करते हैं मजबूरी यह है कि पहले के दौर में इस्लामी ह़ुकूमत थी जो अपनी तरफ से मदारिस के लिए खास इन्तिज़ाम करती थी और उनके लिए औक़ाफ काइम करती थी जिसके ज़रिये तलबा, मुदर्रिसीन बल्कि पूरे इदारे का नज़्म बरक़रार रहता था और उनका फायदा होता था और हैसियत दार लोग भी दीन की हमदर्दी की बिना पर ह़ुसूले सवाब की नियत से तलबा और मुदर्रिसीन की किफालत करते थे अब ना इस्लामी ह़ुकूमत रही ना वैसे खैर ख्वाह रहे और नाही माज़ी की तरह मुखलिस उ़लमा रहे (إلا ماشاء الله) जबकि इस्लाम व मुस्लिमीन के फरोग़ व फलाह़ के लिए दीनी तअ़लीम का सिलसिला जारी रखना बहुत ज़रूरी है इसी लिए उ़लमाये इस्लाम ने ज़कात के बयान में निहायत दयानत दारी से यह मस्अला वाजे़ह तौर पर बयान कर दिया कि ज़कात मुस्तहिक़ को दी जाए और वो अपनी मर्ज़ी से जिस जाइज़ मस़रफ में खर्च करना चाहे तो खर्च करना जाइज़ है इसी का नाम हीला ए शरई़ है जिसकी अस्ल क़ुरआन व हदीस में मौजूद है।
*📚 फतावा ए बह़रुल उ़लूम जिल्द 2*
*👉 इस वक्त मुल्क भर में इस्लामी तअ़लीम और मदारिसे इस्लामिया की जो खस्ता हाली है सब आपके पेशे नज़र है लिहाज़ा जहां आप दीगर मुस्तह़िक़ हज़रात को ज़कात व फितरा दें वहीं आप हज़रात मदारिसे इस्लामिया को भी ज़कात व फितरा की रक़म पेश करें बल्कि ह़स्बे ह़ैसियत अपनी जेबे खास से ज़्यादा से ज़्यादा तआ़वुन (इम्दाद) करें आपके तआ़वुन से मदारिस का तअ़लीमी नज़्म (System) बह़ाल रहेगा और उससे फारिग़ होने वाले अफराद (उ़लमा) पूरी दुनिया में खिदमते दीन व खल्क़ और इ़ल्मे दीन को आ़म करते नज़र आयेंगे!*
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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