फ़तहे_मक्का
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*🥀 फ़तहे_मक्का 🥀*
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कल की पोस्ट के आगे.......
🔛 चेहरा ए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर मुस्कुराहट फैली ठीक है अबू सुफियान तो मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूं और तुम्हारी दरख्वास्त क़ुबूल करता हूं जाओ तुम आज़ाद हो, सुबह हम मक्का में दाखिल होंगे इंशा अल्लाह मैं तुम्हारे घर को जहां आज तक इस्लाम और हमारे खिलाफ साज़िशें होती रहीं, जाए अमन क़रार देता हूं, जो तुम्हारे घर में पनाह ले लेगा वो महफूज़ है,
अबू सुफियान की आंखें हैरत से फटती जा रही थीं
" और मक्का वालों से कहना जो बैतुल्लाह में दाखिल हो गया उसको अमान है, जो अपनी किसी इबादतगाह में चला गया, उसको अमान है, यहां तक कि जो अपने घरों में बैठा रहा उसको अमान है,
जाओ अबू सुफियान जाओ और जाकर सुबह हमारी आमद का इंतज़ार करो, और कहना मक्का वालों से कि हमारी कोई तलवार म्यान से बाहर नहीं निकली होगी, हमारा कोई तीर तरकश से बाहर नहीं होगा, हमारा कोई नेज़ा किसी की तरफ सीधा नहीं होगा जब तक कि कोई हमारे साथ लड़ना ना चाहे"
अबू सुफियान ने हैरत से मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ، की तरफ देखा और कांपते हुए होंठों से बोलना शुरू किया
" اشھد ان لاالہٰ الا اللہ و اشھد ان محمّد عبدہُ و رسولہُ "
सबसे पहले उमर इब्ने खत्ताब आगे बढ़े और अबू सुफियान को गले से लगाया,"मरहबा ऐ अबू सुफियान" अब से तुम हमारे दीनी भाई हो गए, तुम्हारी जान, माल हमारे ऊपर वैसे ही हराम हो गया जैसा कि हर मुसलमान का दूसरे पर हराम है, तुमको मुबारक हो कि तुम्हारी पिछली सारी खताएं मुआफ कर दी गईं और अल्लाह तबारक व तआला तुम्हारे पिछले गुनाह मुआफ फरमाए, अबू सुफियान हैरत से खत्ताब के बेटे को देख रहे थे, ये वही हैं कि चंद लम्हे पहले जिसकी आंखों में उनके लिए शदीद नफ़रत और गुस्सा था और जो उसकी जान लेना चाहता था, अब वही उसको गले से लगा कर भाई बोल रहा था
ये कैसा दीन है?
ये कैसे लोग हैं?
सबसे गले मिलकर और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के हाथों पर बोसा देकर अबू सुफियान खैमे से बाहर निकल गए,
वो (दहशतगर्द) अबू सुफियान कि जिसके शर से मुसलमान आज तक तंग थे उन्ही के दरमियान से सलामती से गुज़रते हुए जा रहे थे, जहां से गुज़रते, उस इस्लामी लश्कर का हर फर्द, हर जंगजू, हर सिपाही जो थोड़ी देर पहले उनकी जान के दुश्मन थे अब आगे बढ़ बढ़ कर उनसे मुसाहफा कर रहे थे,खुश आमदीद कह रहे थे
#अगले_दिन:-
मक्का शहर की हद पर जो लोग खड़े थे उनमें सबसे नुमाया अबू सुफियान थे, मुसलमानों का लश्कर मक्का में दाखिल हो चुका था किसी एक तलवार, किसी एक नेज़े की अनी, किसी एक तीर की नोक पर खून का एक क़तरा भी नहीं था, लश्करे इस्लाम को हिदायत मिल चुकी थी,
किसी के घर में दाख़िल मत होना
किसी की इबादतगाह को नुक़सान मत पहुंचाना
किसी का पीछा मत करना
औरतों और बच्चों पर हाथ ना उठाना
किसी का माल ना लूटना
बिलाल हब्शी रदिअल्लाहु तआला अन्हु आगे आगे ऐलान करते जा रहे थे
"मक्का वालों ! रसूल ए खुदा صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की तरफ से आज तुम सबके लिए आम मुआफी का ऐलान है
किसी से उसके साबिक़ा आमाल की बाज़पुर्श नहीं की जाएगी,
जो इस्लाम क़ुबूल करना चाहे वो कर सकता है
जो ना करना चाहे वो अपने साबिक़ा दीन पर रह सकता है,
सबको उनके मज़हब के मुताबिक़ इबादत की खुली इजाज़त होगी
सिर्फ मस्जिदे हराम (काबा) और उसकी हुदूद के अंदर बुत परस्ती की इजाज़त नहीं होगी
किसी का ज़रीया ए मआश छीना नहीं जाएगा
किसी को उसकी ज़मीन व जायदाद से महरूम नहीं किया जाएगा
ग़ैर मुसलमानों की जान माल की हिफाज़त मुसलमान करेंगे
ऐ मक्का के लोगो
हिन्दा अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी लश्कर ए इस्लाम को गुज़रते देख रही थी
उनका दिल गवाही नहीं दें रहा था कि "हज़रत हम्ज़ा" का क़त्ल उनको मुआफ कर दिया जाएगा,
लेकिन अबू सुफियान ने तो रात यहीं कहा था कि
"इस्लाम क़ुबूल कर लो सब ग़ल्तियां मुआफ हो जाएंगी"
मक्का फतह हो चुका था
बिना ज़ुल्मो तशद्दुद, बिना खून बहाए, बिना तीरो तलवार चलाए,
लोग जौक़ दर जौक़ उस आफाक़ी मज़हब को इख़्तियार करने और अल्लाह की तौहीद और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की रिसालत का इक़रार करने मस्ज़िद हराम के सहन में जमा हो रहे थे,
और तभी मक्का वालों ने देखा
"उस हुज़ूम में हिन्दा भी शामिल थी"
ये हुआ करता था इस्लाम ये थी उसकी तालीमात- ये सिखाया था रहमते आलम صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने.....
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