ग़ौसुल-आज़म शेख़ अब्दुल कादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैह
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*🥀 ग़ौसुल-आज़म शेख़ अब्दुल कादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैह 🥀*
🔛 हुज़ूर ग़ौसे आज़म रहमतुल्लाह अलैह कि बचपन शरीफ़ की सात करामात
[1] हुज़ूर ग़ौसे आज़म रहमतुल्लाह अलैह मादर ज़ाद वली थे। आप ऱह़मतुल्लाह अलैह अभी अपनी मां के पेट में थे और माँ को जब छींक आती और उस जब वह अल्हम्दुलिल्लाह कहतीं तो आप ऱह़मतुल्लाह अलैह पेट में ही जवाबन यरहमुकिल्लाह कहते।
*📚 अल-हकाइक़ फी़ अल-हदाइक़ सफ़ह 139*
[2] आप ऱह़मतुल्लाह अलैह यकुम रमजा़नुल मुबारक ब-रोज़ पीर (सोमवार) सुबह-सादिक़ के वक़्त दुनिया में जलवागर हुए, उस वक़्त होंठ धीरे-धीरे हरकत कर रहे थे और अल्लाह-अल्लाह की आवाज़ आ रही थी।
*📚 अल-हकाइक़ फ़िल-हदाइक़ सफ़ह 139*
[3] जिस दिन आप ऱह़मतुल्लाह अलैह पैदा हुए, उस दिन आप ऱह़मतुल्लाह अलैह के दियारे विलादत जीलान शरीफ़ में 1100 लड़के पैदा हुए वो सब के सब लड़के थे और सभी वलियुल्लाह बने।
*📚 तफ्रीहुल-ख़ातिर सफ़ह 15*
[4] ग़ौसुल-आज़म रहमतुल्लाह अलैह ने पैदा होते ही रोज़ा रख लिया और जब सूरज गु़रूब हुआ उस वक़्त माँ का दूध नोश फ़रमाया। सारा रमजा़नुल मुबारक यही आपका रोज़ाना का मामूल रहा।
*📚 बह्ज़तुल-असरार सफ़ह 172*
[5] पाँच बरस की उम्र में जब पहली बार बिस्मिल्लाह पढ़ने की रस्म के लिए किसी बज़ुर्ग के पास बैठे, तो 'अऊज़ और बिस्मिल्लाह पढ़कर सुरह-ए-फा़तिहा और अलिफ़-लाम-मीम से लेकर अठारह पारे पढ़ कर सुना दिए। उन बज़ुर्ग ने कहा बेटे और पढ़िए आपने फरमाया बस मुझे इतना ही याद है क्योंकि मेरी माँ को भी इतना ही याद था। जब मैं अपनी माँ के पेट में था, उस वक़्त वह पढ़ा करती थीं, मैंने सुनकर याद कर लिया था।
*📚 अल-हकाइक़ फि़ल-हदाइक़ सफ़ह 140*
[6] जब आप रहमतुल्लाह अलैह लड़कपन में खेलने का इरादा फरमाते, ग़ैब से आवाज़ आती: "ऐ अब्दुल कादिर! हम ने तुझे खेलने के वास्ते नहीं पैदा किया।
*📚 अल-हकाइक़ फिल-हदाइक़ सफ़ह 140*
[7] मदरसे में जाने पर
आप ऱह़मतुल्लाह अलैह जब मदरसे में तशरीफ़ ले जाते तो आवाज़ आती:
“अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल के वली को जगह दे दो।”
*📚 बह्ज़तुल-असरार सफ़ह 48*
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